तीस्ता नदी में बहे हाथी के बच्चे का रेस्क्यू, मछुआरों की सूझबूझ से मां से मिला नन्हा मेहमान
उत्तर बंगाल में उफनती तीस्ता नदी की तेज धारा में बहकर आए एक तेरह दिन के हाथी के बच्चे को पांच स्थानीय मछुआरों ने सुरक्षित बचा लिया। अपनी जान जोखिम में डालकर किए गए इस रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद न सिर्फ हाथी के बच्चे की जान बची, बल्कि उसे वन विभाग की मदद से उसके झुंड और मां तक भी पहुंचा दिया गया।

नदी की तेज धार में संघर्ष करता दिखा नन्हा हाथी
यह घटना इस हफ्ते की शुरुआत की है जब जलपाईगुड़ी के पांच मछुआरे—बबलू दास, मिथुन दास, कादर दास, बिस्वनाथ और गोपाल—ने नदी के पानी के बीच एक नन्हीं सी सूंड को बाहर निकलते देखा। उफनती नदी की धारा में यह तेरह दिन का हाथी का बच्चा अपने झुंड से अलग होकर चार किलोमीटर नीचे बहता हुआ आ गया था और पानी में तैरने के लिए संघर्ष कर रहा था। मछुआरों ने बिना देर किए अपनी नाव तेज धार में उतार दी और नदी में कूदकर डरे-सहमे बच्चे को खींचकर अपनी संकरी नाव पर चढ़ाया।
वन विभाग की मदद से मां से हुआ मिलन
नाव को सुरक्षित किनारे पर लाने के बाद मछुआरों ने उस बच्चे को वनकर्मियों के हवाले कर दिया। उसे काठाम्बारी रेंज ऑफिस ले जाया गया जहां पशु चिकित्सकों की देखरेख में उसकी जांच की गई। असली चुनौती उस बच्चे को वापस उसके परिवार तक पहुंचाना थी, क्योंकि कई बार इंसानों के संपर्क में आने के बाद झुंड अपने बच्चों को अपनाने से इंकार कर देते हैं। वन अधिकारियों और स्थानीय लोगों ने मिलकर करीब दो घंटे तक झुंड की तलाश की और आखिरकार टीम बच्चे को बैराज के पार तीस्ता नदी के उस सूखे हिस्से तक ले गई जहां उसके झुंड के होने की संभावना थी।

मां ने लगाया गले और पूरा हुआ रेस्क्यू
तलाश का यह प्रयास सफल रहा और मां हाथी अपने बच्चे के पास पहुंचकर उसे अपना लिया। इस पूरी घटना ने यह साबित कर दिया कि निस्वार्थ भाव से किसी की मदद करने से मिलने वाली आंतरिक खुशी सबसे अनमोल होती है। बिना किसी पुरस्कार की उम्मीद के मछुआरों द्वारा किए गए इस नेक काम ने सभी का दिल जीत लिया और यह घटना इंसानी संवेदनाओं की एक बेहतरीन मिसाल बन गई।
