भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और महंगे इलाज का संकट
स्वस्थ रहना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार माना गया है, लेकिन देश में चिकित्सा और उपचार से जुड़ा बाजार लगातार बड़ा होता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अच्छे स्वास्थ्य को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक पहलुओं से जोड़ा है, परंतु भारत में स्वास्थ्य का पैमाना मुख्य रूप से बीमारियों के इलाज तक ही सिमट कर रह गया है। इस विषय से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू हैं जिन पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।

बजट आवंटन और ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या
संविधान के प्रावधानों के अनुसार स्वास्थ्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र का विषय है, लेकिन केंद्र स्तर पर भी योजनाएं संचालित होती हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हिस्सा खर्च करने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि, संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार बजट आवंटन केवल 1.43 प्रतिशत रहने के कारण केवल 70 प्रतिशत आबादी को ही विभिन्न योजनाओं और बीमा का लाभ मिल पा रहा है। देश की आबादी का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा, यानी करीब 40 करोड़ लोग ‘मिसिंग मिडिल’ के दायरे में आते हैं। समय पर उचित चिकित्सा न मिलने या फिर अत्यधिक महंगे उपचार के कारण करोड़ों परिवारों का कर्ज के बोझ तले दब जाना एक गंभीर त्रासदी है।
सरकारी अस्पतालों की स्थिति और निजी क्षेत्र
देश की राजधानी दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों के सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कई प्रमुख अस्पतालों में एमआरआई और गंभीर ऑपरेशनों के लिए लंबी वेटिंग लिस्ट चल रही है तथा मरीजों को बाहर से दवाइयां और अन्य सामग्री खरीदने के लिए विवश होना पड़ता है। संसदीय समिति के आंकड़ों के मुताबिक, निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च सरकारी संस्थानों की तुलना में पांच से दस गुना तक अधिक होता है। अदालतों के पुराने फैसलों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करने की बजाय शहरी इलाकों और अस्पतालों की ग्रेडिंग पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

नियमों का क्रियान्वयन और डिजिटल रिकॉर्ड
अस्पतालों के नियमन के लिए कानून और नियम बनने के बावजूद उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। सरकारी भूमि पर बने कॉर्पोरेट अस्पतालों द्वारा गरीब मरीजों के लिए तय रियायतों में आनाकानी करने की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसके अलावा, दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण पाने के लिए जारी आदेशों के बावजूद आम जनता को महंगे दामों पर दवाएं खरीदने पड़ रही हैं। दूसरी ओर, मरीजों और डॉक्टरों के डिजिटल डेटा को केंद्रीय स्तर पर संकलित करने के लिए विभिन्न पोर्टल, सॉफ्टवेयर और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से लगातार रिकॉर्ड दर्ज किया जा रहा है।

