जम्मू-कश्मीर में एनएचपीसी जलविद्युत परियोजनाओं को वापस लेने का कोई प्रस्ताव नहीं

जम्मू-कश्मीर में एनएचपीसी जलविद्युत परियोजनाओं को वापस लेने का कोई प्रस्ताव नहीं

जम्मू-कश्मीर सरकार ने हाल ही में विधानसभा में एक स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि एनएचपीसी लिमिटेड द्वारा संचालित जलविद्युत परियोजनाओं को वापस लेने या उनका स्वामित्व केंद्र शासित प्रदेश को सौंपने का इस समय कोई प्रस्ताव नहीं है। यह जानकारी विधानसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर के दौरान सामने आई। सरकार की ओर से यह बयान ऐसे समय पर आया है जब परियोजनाओं के संचालन और स्थानीय प्रशासन को मिलने वाले वित्तीय लाभों को लेकर चर्चाएं चल रही थीं।

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परियोजनाओं की स्थिति और एमओयू

विधानसभा में पेश किए गए विवरण के अनुसार, सावलकोट (1856 मेगावाट), उड़ी-I चरण-II (240 मेगावाट) और दुल्हस्ती चरण-II (260 मेगावाट) जैसी प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं को 40 साल की अवधि के लिए बूट (BOOT) आधार पर एनएचपीसी को सौंपा गया है। इसके लिए एनएचपीसी और जेकेपीडीसीएल के बीच समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए थे। इन समझौतों के तहत, परियोजनाओं का हस्तांतरण उनके वाणिज्यिक संचालन शुरू होने की तारीख से 40 वर्ष पूरे होने के बाद ही किया जाएगा।

मौजूदा परिचालन और वित्तीय लाभ

वर्तमान में, केंद्र शासित प्रदेश में एनएचपीसी कुल 2,250 मेगावाट की स्थापित क्षमता वाले छह प्रमुख जलविद्युत पावर स्टेशनों का संचालन कर रहा है। इनमें सलाल, उड़ी-I, दुल्हस्ती, किशनगंगा, उड़ी-II और सेवा-II पावर स्टेशन शामिल हैं। पिछले पांच वित्तीय वर्षों के दौरान, इन परियोजनाओं से जम्मू-कश्मीर को जल उपयोग शुल्क, मुफ्त बिजली कोटे और स्थानीय क्षेत्र विकास कोष के माध्यम से महत्वपूर्ण वित्तीय लाभ प्राप्त हुआ है।

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  • जल उपयोग शुल्क: इन पांच वर्षों के दौरान जल उपयोग शुल्क के रूप में कुल 3,582.06 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई है।
  • मुफ्त बिजली और एलएडीएफ: केंद्र शासित प्रदेश को 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली कोटे और 1 प्रतिशत एलएडीएफ का मौद्रिक मूल्य भी मिला है।
  • स्थानीय रोजगार और विकास: इन परियोजनाओं के संचालन से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर और अप्रत्यक्ष आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ रही हैं।

सरकार के अनुसार, एनएचपीसी की इन जलविद्युत परियोजनाओं से मिलने वाले राजस्व और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहलों के माध्यम से स्थानीय बुनियादी ढांचे के विकास में भी निरंतर सहयोग मिल रहा है।

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