मुंधवा जमीन घोटाला मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, पार्थ पवार का नाम शामिल न होने पर की टिप्पणी

मुंधवा जमीन घोटाला मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, पार्थ पवार का नाम शामिल न होने पर की टिप्पणी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1800 करोड़ रुपये के बहुचर्चित मुंधवा जमीन घोटाले में एनसीपी के नवनिर्वाचित सांसद पार्थ पवार का नाम आरोपी के रूप में नहीं जोड़े जाने को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं। न्यायमूर्ति माधव जामदार की पीठ ने इस मामले में पुणे के एक तहसीलदार को अग्रिम जमानत प्रदान की है। अदालत ने मामले की जांच और आरोपियों की भूमिका को लेकर तीखे सवाल पूछे हैं।

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डीजीपी के हलफनामा और अदालत की टिप्पणी

पिछली सुनवाई के दौरान दिए गए निर्देशों के पालन में, राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) ने इस मामले में अपना जवाब अदालत के समक्ष पेश किया। इस हलफनामे में जानकारी दी गई कि पुणे पुलिस कमिश्नर को इस जमीन घोटाले की निष्पक्ष और कानूनी जांच करने के निर्देश दे दिए गए हैं, और डीजीपी ने इस पूरी जांच की निगरानी खुद करने का आश्वासन भी दिया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि जिस ‘अमेडिया’ कंपनी में एक व्यक्ति की केवल 1 प्रतिशत हिस्सेदारी है, उसे आरोपी बनाया गया है, जबकि उसी कंपनी में 99 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले पार्थ पवार को इस दायरे से बाहर क्यों रखा गया है। अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि क्या इस मामले में किसी तरह का विशेष बर्ताव किया जा रहा है।

अग्रिम जमानत और जमीन घोटाले के आरोप

अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद सूर्यकांत येवले और कुंदन गायकवाड़ की अग्रिम जमानत याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। इन दोनों याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि उनका इस घोटाले से कोई संबंध नहीं है, जबकि महाराष्ट्र सरकार का आरोप था कि इन्होंने इस घोटाले में सक्रिय भूमिका निभाई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि राजनीतिक रसूख के कारण मुख्य नाम को जांच से दूर रखा गया है।

मुंधवा में 40 एकड़ जमीन का यह सौदा काफी चर्चा में रहा है, जिसमें आरोप है कि 1800 करोड़ रुपये की संपत्ति को कम कीमत पर खरीदा गया और कम स्टांप ड्यूटी चुकाई गई। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद पूर्व में सौदे को रद्द करने की घोषणा भी की गई थी। अदालत अब इस पूरे मामले की गहन और पारदर्शी जांच पर नजर बनाए हुए है।

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