बच्चों को सिखाएं जिंदगी का यह अहम सबक, असफलता से घबराने के बजाय ऐसे करें सामना
अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को जीवन में सिर्फ जीत हासिल करने और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। स्कूल के अंकों से लेकर करियर के इंटरव्यू तक, हर जगह सफलता पाने की सीख दी जाती है। लेकिन क्या बच्चों को उन पलों के लिए भी तैयार किया जाता है जहां उन्हें असफलता या ‘ना’ का सामना करना पड़ सकता है?

सड़क किनारे दिखती एक अलग वास्तविकता
बड़े शहरों की सड़कों पर ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े होकर छोटी-मोटी चीजें बेचने वाले बच्चों का संघर्ष आम है। लाल बत्ती होने पर जब गाड़ियां रुकती हैं, तो ये बच्चे कारों के बीच जाकर सामान बेचने की कोशिश करते हैं। कई लोग इन्हें नजरअंदाज करते हैं, तो कोई सिर हिलाकर मना कर देता है। तमाम असहज परिस्थितियों और लगातार मिलने वाले इनकार के बावजूद वे बच्चे निराश नहीं होते और अगली गाड़ी की तरफ बढ़ जाते हैं। उनका यह रवैया हमें बहुत कुछ सिखाता है।
अस्वीकार को स्वीकार करने की कला
जिंदगी हर मोर्चे पर हमेशा ‘हां’ नहीं कहती। बिना अपना आत्मविश्वास खोए ‘ना’ सुनना और आगे बढ़ना सीखना एक बहुत बड़ा कौशल है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि किसी भी असफलता या इनकार का मतलब सफर का अंत नहीं होता। जब वे किसी परीक्षा, प्रतियोगिता या इंटरव्यू में असफल हों, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि एक झटके से उनकी काबिलियत कम नहीं हो जाती।

माता-पिता की जिम्मेदारी
पेरेंट्स होने के नाते हमारी भूमिका सिर्फ बच्चों को सफलता के रास्ते पर चलाना नहीं है, बल्कि उन्हें मुश्किल हालातों से मुकाबला करना सिखाना भी है। उन्हें यह बताना आवश्यक है कि हर बार परिणाम मनमुताबिक नहीं आते, लेकिन असली बात बार-बार उठकर दोबारा कोशिश करने की हिम्मत जुटाना है। यही जीवन का सबसे बड़ा और मूल्यवान सबक है।


