आर्थिक वृद्धि अब चुनावी सफलता की गारंटी क्यों नहीं रही?
वैश्विक निवेशक और लेखक रुचिर शर्मा के एक हालिया विश्लेषण के अनुसार, तेज आर्थिक वृद्धि अब किसी भी राजनीतिक दल या नेता के लिए चुनावी सफलता की पक्की गारंटी नहीं रह गई है। अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था का उदाहरण देते हुए यह बताया गया है कि अनुकूल आर्थिक संकेतकों के बावजूद जमीनी स्तर पर मतदाताओं का असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

जीवन-यापन की बढ़ती लागत और महंगाई
तीसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार भले ही तेज होकर करीब चार प्रतिशत तक पहुंच गई हो, लेकिन आम नागरिकों को यह तेजी रास नहीं आ रही है। इसका मुख्य कारण जीवन-यापन की लागत में बेतहाशा वृद्धि है। मतदाताओं के लिए महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है, और पेट्रोल, ऊर्जा तथा घर की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। होम लोन के ब्याज दरें सात प्रतिशत से ऊपर जाने के कारण लोगों के लिए घर खरीदना अत्यंत कठिन हो गया है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और तकनीक को लेकर चिंताएं
अर्थव्यवस्था में सुधार का एक बड़ा हिस्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई क्षेत्र में हो रहे भारी निवेश से आ रहा है। हालांकि, पिछली तकनीकी क्रांतियों के विपरीत, एआई को लेकर आम लोगों में उत्साह कम और चिंताएं अधिक हैं। भारी बिजली की खपत करने वाले डेटा सेंटरों के कारण बुनियादी उपयोगों के बिल बढ़ने की आशंका से स्थानीय स्तर पर इनका विरोध हो रहा है। इसके अलावा, युवाओं में भविष्य में रोजगार छिन जाने का डर भी तेजी से बढ़ रहा है।

वेतन वृद्धि और जमीनी वास्तविकता का अंतर
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े मजबूत दिखने के बावजूद यदि वे आम जनजीवन और सूक्ष्म आर्थिक पहलुओं में नहीं झलकते, तो राजनीतिक रूप से उसका कोई लाभ नहीं मिलता। मुद्रास्फीति के प्रभाव को समायोजित करने के बाद अधिकांश कर्मचारियों के वेतन-वृद्धि की दर नकारात्मक हो गई है, जबकि केवल एआई कौशल वाले कुछ चुनिंदा लोगों को ही भारी-भरकम वेतन मिल रहा है। यही आर्थिक असमानता और जमीनी असंतोष मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर रहा है।


