मेरठ ड्रम हत्याकांड और भारत में महिलाओं को मिलने वाले मृत्युदंड का कानूनी सफर
मेरठ के चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में जिला अदालत द्वारा मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भारत में महिलाओं को मिलने वाले मृत्युदंड का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। एक साल से अधिक समय तक चली सुनवाई और गवाहों के बयानों के आधार पर अदालत ने यह कठोर फैसला सुनाया है। इसके बाद यह सवाल भी सामने आया है कि देश में अब तक कितनी महिलाओं को मौत की सजा मिल चुकी है और न्यायिक प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है।

भारत की जेलों में डेथ रो पर महिलाएं
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश भर की विभिन्न जेलों में काफी संख्या में कैदी मौत की सजा का इंतजार कर रहे हैं, जिनमें कुछ महिलाएं भी शामिल हैं। इनमें से कई मामलों में उच्च न्यायालयों या उच्चतम न्यायालय में सुनवाई जारी है, जबकि कुछ मामलों में दया याचिकाएं भी लंबित हैं। इन मामलों में उत्तर प्रदेश का हिस्सा काफी बड़ा है, जहां डेथ रो पर मौजूद महिला कैदियों की संख्या अच्छी खासी है। इसके अलावा केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की महिलाएं भी इस सूची में शामिल हैं। कई मामलों में सजा की पुष्टि या अपील की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
सजा के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया
निचली अदालत से मौत की सजा मिलने के बाद मामला तुरंत अंतिम रूप नहीं लेता है। कानून के मुताबिक मृत्युदंड की सजा को उच्च न्यायालय से अनुमोदित कराना अनिवार्य होता है। इसके बाद दोषियों के पास उच्चतम न्यायालय में अपील, पुनर्विचार याचिका और सुधारात्मक याचिका जैसे कई कानूनी विकल्प खुले रहते हैं। इसके अतिरिक्त दोषी राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका भी दायर कर सकते हैं। इन सभी कानूनी प्रक्रियाओं के चलते निचली अदालत के फैसले और वास्तविक सजा के क्रियान्वयन के बीच लंबा अंतराल आ जाता है।
स्वतंत्र भारत में फांसी की सजा का ऐतिहासिक मामला
स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में अब तक बहुत ही कम ऐसा मौका आया है जब किसी महिला को वास्तविक रूप से फांसी दी गई हो। रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 1955 में रतन बाई जैन को मृत्युदंड दिया गया था, जो दिल्ली में एक क्लिनिक में प्रबंधक के रूप में कार्यरत थीं। जहर के जरिए तीन लड़कियों की हत्या करने के जुर्म में तमाम अपीलों और दया याचिकाओं के खारिज होने के बाद उन्हें मौत की सजा दी गई थी। न्यायिक रिकॉर्ड में वह स्वतंत्र भारत में फांसी पाने वाली अकेली महिला के रूप में दर्ज हैं।


