85 वर्ष की उम्र में नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के क्या मायने हैं
नोबेल पुरस्कारों की घोषणा के बाद दुनियाभर में सकारात्मकता और गंभीरता का माहौल बन जाता है। भौतिकी, रसायनशास्त्र, चिकित्सा और अर्थशास्त्र जैसे विषयों के साथ-साथ साहित्य और शांति के पुरस्कार भी विशेष ध्यान आकर्षित करते हैं। आज के समय में जब वैश्विक स्तर पर शांति की आवाज मिसाइलों और ड्रोनों के शोर में दबती जा रही है, नोबेल शांति पुरस्कार का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस वर्ष नोबेल समिति ने उम्र, जाति, धर्म और जेंडर की सीमाओं से परे जाकर एक खास शख्सियत को इस सम्मान के लिए चुना है।

मानवाधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुनी गई नवी पिल्लई 85 वर्ष की हैं और भारतीय तमिल मूल की दक्षिण अफ्रीकी महिला हैं। उन्होंने रंगभेद-विरोधी कैदियों का बचाव करने से लेकर दुनिया की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अदालतों और मानवाधिकार संस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि उम्र या कठिन परिस्थितियां मानवीय सेवा के रास्ते में बाधा नहीं बन सकतीं। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने इस बात पर जोर दिया है कि बढ़ते युद्धों के दौर में यह पुरस्कार इस मान्यता को पुष्ट करता है कि स्थायी शांति केवल ताकत पर नहीं, बल्कि कानूनी सिद्धांतों और जवाबदेही पर टिकी होती है।
कठिन परिस्थितियों से कानूनी सफर तक
वर्ष 1941 में डरबन के क्लेयरवुड में एक गरीब तमिल परिवार में जन्मीं नवी पिल्लई ने रंगभेद के माहौल में अपना जीवन बिताया। उन्होंने हार्वर्ड से कानून में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की और ऐसा करने वाली वे पहली दक्षिण अफ्रीकी थीं। शुरुआती दौर में उन्हें नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा और कोई लॉ फर्म उन्हें नौकरी पर रखना नहीं चाहती थी। इसके बावजूद उन्होंने खुद की प्रैक्टिस शुरू की और नटाल में ऐसा करने वाली पहली गैर-गोरी महिला बनीं। उन्होंने रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं का बचाव किया और राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी, जिससे नेल्सन मंडेला जैसे कैदियों को भी न्याय की दिशा में मदद मिली।

भारत से गहरा जुड़ाव
नवी पिल्लई का भारत से भी गहरा नाता रहा है। उनके पिता के परिवार की जड़ें तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले के वथलागुंडु में थीं। उनके दादा-दादी 1890 के दशक में मद्रास प्रेसीडेंसी से नटाल में गन्ने के बागानों में अनुबंधित मजदूरों के तौर पर गए थे। उनके पिता एक बस ड्राइवर थे जिन्होंने बेटियों की शिक्षा पर भी विशेष जोर दिया। अपने जीवन के संघर्षों और उपलब्धियों के बीच उन्होंने तमिलनाडु में अपने रिश्तेदारों से भी संपर्क साधा और शांति की वकालत को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाए रखा।


