सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश, जल निकायों और वेटलैंड्स की सुरक्षा सुनिश्चित करें राज्य
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम रुख में कहा है कि जल निकायों की सुरक्षा न होने की स्थिति में अदालतें मूकदर्शक नहीं रह सकती हैं। देश के सभी राज्यों और संबंधित प्राधिकरणों को आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स का भौतिक सत्यापन करने के साथ ही उनकी सीमाओं का निर्धारण करने का कड़ा निर्देश दिया गया है।

जीवन के अधिकार से जुड़ा है जल संरक्षण
न्यायालय की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जल निकाय लोगों के लिए पेयजल के मुख्य स्रोत हैं। इनका संरक्षण सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जल निकायों के असुरक्षित रहने से जो गंभीर परिणाम सामने आते हैं, उनके प्रति न्यायिक व्यवस्था उदासीन नहीं रह सकती। इस आदेश के तहत राज्यों और संबंधित प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जहां अब तक भौतिक सत्यापन का काम नहीं हुआ है, वहां इसे जल्द से जल्द पूरा किया जाए। इसके साथ ही अधिकारियों को अपनाई गई प्रक्रिया का पूरा विवरण देते हुए अनुपालन हलफनामा भी अदालत में पेश करना होगा।
कार्यान्वयन के लिए मिला चार महीने का समय
आरंभ में शीर्ष अदालत ने इस मामले में चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का विचार रखा था। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि इस व्यापक प्रक्रिया में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और काफी अधिक काम की आवश्यकता है, जिसके लिए अधिक समय चाहिए। व्यावहारिक दिक्कतों को समझते हुए पीठ ने इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न करने के लिए चार महीने का समय निर्धारित किया है।
नौ साल बाद भी सीमांकन अधूरा
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि नियमों के प्रकाशन के पूरे नौ वर्ष बीत जाने के बाद भी जल निकायों का भौतिक सत्यापन और उनका सीमांकन पूरी तरह से पूरा नहीं हो सका है। यह पूरा मामला पक्षी प्रेमी आनंद आर्य, अधिवक्ता एमके बालकृष्णन और गैर-सरकारी संगठन वनशक्ति द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया है।


