बेंगलुरु के प्रोफेसर ने नारियल के सूखे पत्तों से तैयार किया प्लास्टिक का बेहतरीन विकल्प

बेंगलुरु के प्रोफेसर ने नारियल के सूखे पत्तों से तैयार किया प्लास्टिक का बेहतरीन विकल्प

बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साजी वर्गीज ने नारियल के सूखे पत्तों का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल बायोडिग्रेडेबल स्ट्रॉ विकसित किए हैं। सिंगल-यूज प्लास्टिक की समस्या और पेपर स्ट्रॉ की कमियों से निपटने के लिए यह खोज एक अनूठा समाधान बनकर सामने आई है। आमतौर पर बेकार समझकर जलाए जाने वाले इन पत्तों में प्राकृतिक रूप से वाटर-रेपेलेंट वैक्स परत होती है, जो इसे ड्रिंक्स के लिए उपयुक्त बनाती है।

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प्रकृति की इंजीनियरिंग और नारियल के पत्तों की खूबी

टहलने के दौरान प्रोफेसर साजी की नजर जब जमीन पर गिरे सूखे पत्तों पर पड़ी, तो उन्होंने महसूस किया कि पेड़ से टूटने के बाद भी ये पत्ते न तो सड़े थे और न ही नम हुए थे। लैब में जांच करने पर पता चला कि इन पर नेचुरल और फूड-सेफ एपिक्यूटिकुलर वैक्स की एक परत चढ़ी होती है, जो तरल पदार्थ को दूर रखती है। इसके बाद उन्होंने स्टूडेंट्स के साथ मिलकर इस दिशा में काम शुरू किया और ‘ब्राउन रीड एग्री वेस्ट इनोवेशंस’ कंपनी की नींव रखी, जिसके तहत ‘सनबर्ड स्ट्रॉज’ लॉन्च किए गए।

पारंपरिक विकल्पों से क्यों बेहतर है यह उत्पाद

पारंपरिक प्लास्टिक स्ट्रॉ को पर्यावरण में नष्ट होने में सैकड़ों साल लगते हैं और यह जहरीली होती है। वहीं, पेपर स्ट्रॉ बनाने के लिए पेड़ों को काटना पड़ता है और केमिकल के इस्तेमाल के बावजूद वे जल्दी गीली हो जाती हैं। इसके विपरीत, नारियल के पत्तों से बने ये स्ट्रॉ 100 प्रतिशत केमिकल-फ्री और प्राकृतिक होते हैं। ये गर्म और ठंडे दोनों तरह के पेय पदार्थों में तीन से चार घंटे तक टिके रहते हैं और कृषि कचरे का सही उपयोग करते हैं।

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व्यापक स्तर पर सफलता और वैश्विक पहुंच

तटीय क्षेत्रों में बहुतायत में मिलने वाले नारियल के पत्तों के इस उपयोग से पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी मदद मिल रही है। आईआईएम बेंगलुरु के इनक्यूबेटर प्रोग्राम का साथ मिलने के बाद यह स्टार्टअप आज दुनिया के कई देशों में अपने उत्पादों का निर्यात कर रहा है। यह पहल साबित करती है कि सामान्य समस्याओं पर बारीक नजर और जिज्ञासा से बड़े पर्यावरणीय बदलाव लाए जा सकते हैं।

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