विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है ‘लापता वोटरों’ का अनुपात, रिपोर्ट में सामने आई बात
भारत में 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के नागरिकों की कुल संख्या लगभग 100 करोड़ है, लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के आंकड़ों से मतदाता सूचियों को लेकर नए तथ्य सामने आए हैं। देश के 13 बड़े राज्यों में एसआईआर की अंतिम मतदाता सूचियां जारी की जा चुकी हैं, जिनसे यह पता चलता है कि वयस्क आबादी और सूची में दर्ज नामों के बीच अंतर बना हुआ है। राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुमान के मुताबिक इन राज्यों में वयस्क आबादी का एक हिस्सा अंतिम सूचियों से बाहर है।

लापता मतदाताओं के आंकड़े और श्रेणियां
आंकड़ों के अनुसार इन 13 राज्यों में एसआईआर की अंतिम सूची में शामिल लोगों की संख्या कुल वयस्क आबादी का लगभग 88 प्रतिशत है, जबकि करीब 12 प्रतिशत वयस्क सूची से बाहर हैं। यदि इस अनुपात को पूरे देश पर लागू किया जाए तो अनुमान है कि लगभग 12 करोड़ वयस्कों के नाम मतदाता सूचियों में नहीं होंगे। इन लापता मतदाताओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है। पहली श्रेणी उन लोगों की है जिनके नाम पहले सूची में थे लेकिन पुनरीक्षण के दौरान हटा दिए गए, जैसे प्रवासी मजदूर। दूसरी श्रेणी उन छूटे हुए लोगों की है जिनके नाम कभी सूची में दर्ज ही नहीं हुए थे, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की शामिल है। चुनाव आयोग के पूर्व आंकड़ों के अनुसार कुछ बड़े राज्यों में युवा वर्ग के एक बड़े हिस्से के नाम सूची में नहीं मिल पाए थे।

राज्यों के बीच बड़ा अंतर
वयस्क आबादी और पंजीकृत मतदाताओं का यह अनुपात सभी राज्यों में एक समान नहीं है। केरल जैसे राज्य में स्थिति काफी अलग है जहां अनुमानित वयस्क आबादी के 97 प्रतिशत लोगों के नाम अंतिम सूची में दर्ज हैं। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अनुमानित वयस्क आबादी और अंतिम मतदाता सूची में दर्ज लोगों की संख्या के बीच लगभग 17 प्रतिशत का बड़ा अंतर देखा गया है, जो करोड़ों लोगों की संख्या बैठती है। विशेषज्ञों के अनुसार पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान नए नाम जोड़ने की तुलना में नामों को हटाने की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दिए जाने के कारण यह स्थिति बनती है।


