धर्म और राजनीति के बढ़ते प्रभाव पर पंडित विजयशंकर मेहता के विचार
आज के समय में जीवन के हर क्षेत्र में राजनीति का प्रभाव साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। नैतिकता का स्तर कम हो रहा है और राजनीति ने धर्म में प्रवेश करके इसे सबसे अधिक प्रभावित किया है। इस विषय पर पंडित विजयशंकर मेहता ने अपने कॉलम में विस्तार से प्रकाश डाला है।

धर्म के क्षेत्र में राजनीति का प्रवेश
धर्म और राजनीति के इस मेल में मुख्य रूप से तीन प्रकार के लोग सामने आए हैं। पहले प्रगतिशील वर्ग के लोग हैं जिन्होंने इसका कुछ सदुपयोग तो किया, लेकिन अपने स्वार्थ के लिए इसका दुरुपयोग करने से भी पीछे नहीं हटे। दूसरे परंपरावादी लोग रहे, जिन्होंने कई सकारात्मक बातों की तरफ से आंखें मूंद लीं जिससे धर्म को नुकसान पहुंचा। इसके अलावा राजनेताओं ने भी इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी। इन सब कारणों के परिणामस्वरूप आज की युवा पीढ़ी में धर्म के प्रति उदासीनता का भाव देखने को मिल रहा है, जबकि सच्चे साधु-संत इस पूरी स्थिति में तटस्थ बने रहे।
परिवारों तक पहुंची राजनीति
राजनीति का यह दायरा केवल सार्वजनिक जीवन तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे इसने घर-परिवारों में भी अपनी जगह बना ली है। पति-पत्नी के रिश्ते में अपेक्षाएं अधिक होने के कारण कई बार आपसी समीकरण जटिल हो जाते हैं, लेकिन अब माता-पिता और बच्चों के आपसी संबंधों में भी राजनीति जैसी प्रवृत्तियां देखने को मिलने लगी हैं। अपना हित साधने और सामने वाले को नजरअंदाज करने की यह प्रवृत्ति पारिवारिक ताने-बाने के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हो रही है।

समाधान क्या है
इस स्थिति से निपटने के लिए केवल एक ही प्रभावी मार्ग नजर आता है कि धर्म को उसके सही स्वरूप में समझा जाए। जब तक धर्म को गहराई से समझकर अपने दैनिक जीवन में नहीं उतारा जाएगा, तब तक इस तरह की समस्याओं से पूरी तरह पार पाना मुश्किल होगा।


