अमेठी के पारंपरिक कुम्हारों का संकट: घटती आय और मिट्टी की कमी से अस्तित्व की लड़ाई
अमेठी में पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कुम्हार कला आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। मिट्टी की भारी किल्लत और लगातार बढ़ती महंगाई के कारण यह प्राचीन हस्तकला हाशिए पर जाने को मजबूर हो गई है।

कच्चे माल की भारी किल्लत और बढ़ती लागत
स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि पारंपरिक व्यवसाय को जीवित रखना अब बहुत कठिन होता जा रहा है। तालाबों के पास आसानी से मिलने वाली मिट्टी अब नहीं मिल पाती है, जिसके कारण कारीगरों को पैसे देकर मिट्टी खरीदनी पड़ती है। एक ट्रॉली मिट्टी की कीमत सात से आठ सौ रुपये तक चुकानी पड़ रही है। इसके अलावा ईंधन का खर्च और तैयार उत्पादों का उचित मूल्य न मिलना भी बड़ी समस्याएं बनी हुई हैं।
सरकारी योजनाएं और जमीनी हकीकत
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के अंतर्गत आने वाले माटीकला बोर्ड द्वारा इलेक्ट्रॉनिक चाक वितरित किए गए हैं, लेकिन बिजली की अनियमित आपूर्ति और तकनीकी दिक्कतों के कारण कई कारीगर आज भी पारंपरिक चाक का ही उपयोग कर रहे हैं। हालांकि जिला प्रशासन का कहना है कि पारंपरिक शिल्प को बढ़ावा देने के लिए पट्टे पर जमीन आवंटित करने के प्रयास किए जा रहे हैं और कारीगरों को स्थानीय बाजारों व प्रदर्शनियों से जोड़ने के प्रयास जारी हैं, ताकि उनकी आय में सुधार हो सके।

जीविका चलाने का संघर्ष
बर्तनों की बिक्री से बहुत कम मुनाफा होने के कारण परिवारों का गुजारा मुश्किल से हो पाता है। कई परिवारों के पास मिट्टी के लिए पट्टा नहीं है, जिससे उन्हें खुले बाजार से कच्चा माल खरीदना पड़ता है। आर्थिक तंगी के कारण इस पुश्तैनी पेशे से जुड़े कई लोग अन्य कार्यों की ओर रुख कर रहे हैं या पलायन करने को मजबूर हैं, जिससे इस प्राचीन कला का भविष्य खतरे में पड़ गया है।


