अमेरिकी टैरिफ नीति और भारत के ऊर्जा आयातों पर बढ़ता दबाव

अमेरिकी टैरिफ नीति और भारत के ऊर्जा आयातों पर बढ़ता दबाव

अमेरिका में रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाले ग्राहम बिल को कानूनी रूप दिए जाने के बाद भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इस नए कानून के तहत रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए जाने का प्रावधान है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है।

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ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिकी प्रतिबंधों का असर

भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और बाजार की स्थितियों के अनुसार अलग-अलग स्रोतों से आयात जारी रखेगा। हालांकि, पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का 30 प्रतिशत से 52 प्रतिशत तक हिस्सा रूस से खरीदता रहा है। जुलाई के दौरान भारत ने रिकॉर्ड मात्रा में तेल आयात किया था, ऐसे में रूसी तेल से दूरी बनाना देश के लिए आसान नहीं होगा।

ऐतिहासिक अनुभव और सीमित विकल्प

अतीत के अनुभवों को देखें तो अमेरिका के कड़े रुख के आगे भारत को पहले भी अपने ऊर्जा स्रोतों में बदलाव करने पड़े हैं। वर्ष 2019 में वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगने के बाद वहां से आयात समाप्त हो गया था, और इसी तरह ईरान से होने वाली तेल आपूर्ति भी अमेरिकी दबाव के चलते शून्य हो गई थी। यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत ने रियायती दरों पर रूस से तेल खरीदना शुरू किया था।

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विशेषज्ञों का मानना है कि इस वैश्विक टैरिफ विवाद से निपटने के मामले में चीन के मुकाबले भारत के पास सीमित विकल्प हैं। चीन के पास रेयर अर्थ, मैग्नेट और दवाइयों के लिए जरूरी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स जैसे मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक हथियार मौजूद हैं, जिनका उपयोग वह दबाव बनाने के लिए कर सकता है। वहीं, भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच संतुलन बनाने में सावधानी बरतनी होगी।

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