सर्वपितृ अमावस्या और नवरात्र का पर्व: जानिए शक्ति और संबंधों का महत्व
सर्वपितृ अमावस्या का यह दिन रिश्तों की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। यह वह अवसर है जब हम उन सबका स्मरण करते हैं, जिनका हम अंश और वंश हैं। इस विशेष दिन के साथ ही हम नवरात्र के पावन पर्व में प्रवेश करते हैं। हमारे पितृ हमारी शक्ति के वास्तविक स्रोत हैं, और नवरात्र का यह पूरा समय उसी शक्ति के सही और सकारात्मक सदुपयोग के दिन होते हैं।

अग्रसेन जयंती और परंपराओं का संदेश
एक सुंदर संयोग यह है कि नवरात्र के पहले दिन ही महाराजा अग्रसेन की जयंती भी आती है। उन्होंने अपने पितरों के साथ संबंधों को निभाने और अपनी शक्ति के सदुपयोग के नए तथा अनूठे मापदंड स्थापित किए थे। महाराजा अग्रसेन का जीवन अपने आप में एक संपूर्ण विश्वविद्यालय के समान है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता की शिक्षा एक साथ चलती है और दोनों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
प्राणों का सदुपयोग और श्वास की जागरूकता
नवरात्र के ये नौ दिन हमें यह गहराई से सिखाते हैं कि हमारे प्राणों का भरपूर और उचित उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। योग दर्शन के अनुसार, जब हमारी सांस अंदर की तरफ आती है, तो उसमें ईश्वर का वास होता है या ईश्वर विराजते हैं; और जब वही सांस बाहर जाती है, तो हम ईश्वर में ही विलीन हो जाते हैं।

शरीर के सात शक्ति केंद्र और योग
इन दोनों अवस्थाओं यानी भीतर विराजने और बाहर विलीन होने की प्रक्रिया को गहराई से समझने की आवश्यकता है। यदि मनुष्य अपनी आती-जाती हर एक सांस के प्रति पूरी तरह जागरूक हो जाए, तो हमारे शरीर के भीतर जो सात प्रमुख शक्ति केंद्र हैं, उनमें एक विशेष कंपन उत्पन्न होता है। यही जागरूकता और सजगता हमारे लिए इन नौ दिनों को पूरी तरह सार्थक और ऊर्जावान बना देती है।


