कांग्रेस के नेतृत्व और आपातकाल पर सोनिया गांधी का बयान, आत्मकथा में किए कई खुलासे
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने एक हालिया साक्षात्कार के दौरान पार्टी के नेतृत्व और भाई-भतीजावाद से जुड़े सवालों पर खुलकर चर्चा की। यह बातचीत उनकी आगामी आत्मकथा के अंश सामने आने के समय हुई है, जिसमें उन्होंने देश के राजनीतिक इतिहास और निजी जीवन के कई पहलुओं पर बात की है।

नेपोटिज्म और पार्टी नेतृत्व के सवाल
साक्षात्कार में जब सोनिया गांधी से यह सवाल पूछा गया कि कांग्रेस पार्टी हमेशा गांधी परिवार के दायरे से बाहर क्यों नहीं निकल पाती है, तो उन्होंने इसका सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि यह सवाल पार्टी से पूछा जाना चाहिए। भाई-भतीजावाद के आरोपों पर उन्होंने चुनाव लड़ने और हार-जीत का जिक्र किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी पर एक ही परिवार का प्रभाव बने रहने के कारण इन आरोपों से बचना मुश्किल होता है, हालांकि सोनिया का यह भी मानना है कि कांग्रेस आज भी एक मजबूत राजनीतिक विकल्प बनने की क्षमता रखती है। यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान लगे भ्रष्टाचार के विवादों पर उन्होंने कहा कि अधिकांश मामलों में संबंधित मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।
1975 के आपातकाल को माना गलती
सोनिया गांधी ने साल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के फैसले को एक गलती करार दिया। उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि खुद इंदिरा गांधी भी बाद में इस बात को महसूस करने लगी थीं और आपातकाल के दौरान वह कभी सहज नहीं थीं। इस फैसले को लेकर परिवार के भीतर भी मतभेद थे। उनके अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस कदम का विरोध किया था और चुनाव तक इंतजार करने की सलाह दी थी, जबकि संजय गांधी विपक्ष के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के पक्ष में थे।
पारिवारिक त्रासदियों और हत्याओं का जिक्र
इस बातचीत में सोनिया गांधी ने अपने जीवन के सबसे दर्दनाक पलों को भी साझा किया, जिसमें 1984 में इंदिरा गांधी और 1991 में राजीव गांधी की हत्या का सदमे शामिल है। उन्होंने 1984 के उस दिन को याद किया जब इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने गोली मार दी थी। इस दुखद घटना और उसके बाद आए लंबे अवसाद के दौर को उन्होंने अपने जीवन का सबसे कठिन समय बताया।


