सुप्रीम कोर्ट ने छह साल की बच्ची की हत्या और यौन उत्पीड़न के मामले में मौत की सजा को उम्रकैद में बदला
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में छह साल की अपनी सौतेली बेटी के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न करने और गला घोंटकर उसकी हत्या करने के दोषी की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत्युदंड जैसी अपरिवर्तनीय सजा केवल उन अपराधियों के लिए आरक्षित है जिनके कभी न सुधरने की बात पूरी तरह साबित हो चुकी हो।

न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने अपने 157 पन्नों के फैसले में कहा कि पूरी उम्र के लिए जेल की सजा—जो गंभीरता के मामले में मौत के ठीक बाद आती है—समाज की सुरक्षा भी करती है और उचित दंड भी सुनिश्चित करती है, साथ ही सुधार की संभावना को भी खुला रखती है जिसे राज्य इस मामले में खारिज नहीं कर सका। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा भुगतनी होगी, जिसमें किसी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी और यह उसके प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जारी रहेगी।
सुधार की संभावना और सजा का आधार
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में अपराध बेहद गंभीर है और इसमें असाधारण बातें भी शामिल हैं, लेकिन दोषी के पक्ष में कुछ वास्तविक परिस्थितियां भी मौजूद हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां कोई गंभीर और पर्याप्त विकल्प मौजूद हो, वहां मौत की सजा देना उचित नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब आरोपी के पूरी तरह सुधार से बाहर होने की बात साबित न हुई हो।
यह फैसला दोषी द्वारा मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के 2019 के उस निर्णय के खिलाफ दायर अपील पर आया है, जिसमें उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और उच्च न्यायालय के उस फैसले में कोई गलती नहीं पाई जिसमें आरोपी को दोषी ठहराया गया था, लेकिन सजा के स्वरूप पर विचार करते हुए मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया।
घरेलू हिंसा और चुप्पी पर अदालत की टिप्पणी
पीड़िता की मां की गवाही का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि यह गवाही पूरी तरह विश्वसनीय थी और इसे चिकित्सा साक्ष्यों का समर्थन प्राप्त था। घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के मामलों में महिलाओं की चुप्पी पर बात करते हुए अदालत ने कहा कि भारतीय संदर्भ में ऐसी हिंसा को सहन करना और चुप रहना आम बात है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि कई महिलाएं अपने जीवनसाथी द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के खिलाफ मदद नहीं मांग पाती हैं, और इस चुप्पी को गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का आधार नहीं बनाया जा सकता।


